Faridoon Shahryar's Blog


Friday, October 25, 2019

बराबरी का परचम

बराबरी का परचम

फ़रीदूं शहरयार की नज़्म 

अम्मी की परेशानी
कुछ दस्तावेज़ पुराने 
पहचान की शिनाख़्त
वफ़ादारी का सबूत
कितना समझाया
कितना बहकाया
मां का दिल है 
बेचैन है
मुरझाया सा है

एक और मां का फ़ोन आया
"यासिर को फ़ोन करते रहना," उन्होंने कहा
आवाज़ में गुज़ारिश 
सांसों में मायूसी
अपने जाने के बाद भी 
घोंसले को आबाद रखने की
पुरज़ोर कोशिश 

इंशा को में भी तो
हर रोज़ तलख़ीन
करता रहता हूं
एक बेहतर समाज
में मुस्कुराए वो
आज़ादी जहां हक़ हो
भीख की गुहार नहीं
बराबरी का परचम 
जहां पुरसरार बुलंद हो
वहीं सांस ले 
मेरी बच्ची 
मैं चाहे नफ़रत  की आंधी में
फ़ना हो जाऊं
कोई बात नहीं

1 comment: