Faridoon Shahryar's Blog


Sunday, December 22, 2019

Zulm

ज़ुल्म की काली लंबी रात
लहू में डूबी, सिसकती रात 
#FaridoonShahryar

Saturday, November 16, 2019

मैं तय्यार हूं

मैं तय्यार हूं 
फ़रिदून शहरयार की नज़्म 

रगों में ख़ून की मिक़दार कुछ कम है
पानी भी है थोड़ा सा शायद
समझौता किया है
एक बार फिर से
दरिंदों की चीख़ों
में अब वो बात नहीं 
वो दहाड़ते अब भी हैं
पर फिर भी सो जाता हूं 
थोड़ा मुश्किल से ही सही 
लेकिन हस्ता रहता हूं 
किसी ना किसी बहाने से 
जीने की लत को नया जामा 
पहनाने की कोशिश में तल्लीन हूं
कोई और फ़रेब बुनो 
जाल फेको 
वो हर ख़्वाब जो तुमने देखा था
शायद ज़रूर कामयाब होगा 
मैंने भी ठान लिया है
खुशी से दोस्ती क़ायम रखूंगा 
आसुओं में लतपत सही 
उनकी नमी तुम्हारे आंखों के
दर तक नहीं पहुंचेगी 
आओ आगे बढ़ो 
मैं तय्यार हूं

Saturday, November 2, 2019

आस की कश्ती

आस की कश्ती 
फ़रीदून शहरयार की नज़्म 

बादलों के पार
ख़्वाब झील में
आस की कश्ती 
ख़ामोश उम्मीदों को
जज़्ब किए
बहे जा रही है

पहाड़ों का पैग़ाम 
आसमान पर 
गहरे हुरूफ़ में 
नाज़िल हुआ है
आंखों से नाउमीदी को पोछो
उठो, हाथ बढ़ाओ 
मुस्कुराओ

Friday, October 25, 2019

बराबरी का परचम

बराबरी का परचम

फ़रीदूं शहरयार की नज़्म 

अम्मी की परेशानी
कुछ दस्तावेज़ पुराने 
पहचान की शिनाख़्त
वफ़ादारी का सबूत
कितना समझाया
कितना बहकाया
मां का दिल है 
बेचैन है
मुरझाया सा है

एक और मां का फ़ोन आया
"यासिर को फ़ोन करते रहना," उन्होंने कहा
आवाज़ में गुज़ारिश 
सांसों में मायूसी
अपने जाने के बाद भी 
घोंसले को आबाद रखने की
पुरज़ोर कोशिश 

इंशा को में भी तो
हर रोज़ तलख़ीन
करता रहता हूं
एक बेहतर समाज
में मुस्कुराए वो
आज़ादी जहां हक़ हो
भीख की गुहार नहीं
बराबरी का परचम 
जहां पुरसरार बुलंद हो
वहीं सांस ले 
मेरी बच्ची 
मैं चाहे नफ़रत  की आंधी में
फ़ना हो जाऊं
कोई बात नहीं

Monday, October 21, 2019

पागलों की बस्ती

पागलों की बस्ती 
फरिदूं शहरयार की नज़्म 

कोई हवा की वुसअतों को
कैद कर सके 
ऐसा कभी हुआ है क्या
कोई खुशबू की हदों को
एक तंग दायरे में 
महदूद कर सके 
दीवानापन नहीं तो क्या है ये
मौसिखी के मिज़ाज पर
अदाओं के रिवाज पर 
हिजाब कोई डाल सके 
सोचा भी कैसे ये
ये फरमान तो नाजायज़ है
नासाज़ हैं ये सिलवटें 
समाज पर कलंक है
भद्दे से दाग़ ये
पागलों की इस बस्ती में
शोर है अजीब सा 
अपनी ही घुट्ती सांसों में
हसरतों के सिसकने के 
चन्द लम्हे बाक़ी है
ख्वाबों के बीच की ये
दीवार बहुत ऊंची है

Sunday, October 13, 2019

बस यही मकसद है

बस यही मक़सद है
फरीदूं शहरयार की नज़्म 

आंखों ने खज़ाना 
जमा किया है
दरिया की मौजों का
पहाडों की करवटों का
पत्तियों की बौछारों का
समंदर की खामोशी का
सूरज की असूदगी का
रास्तों की परछाइयों का
झरनों की हरकतों का
आसमान के नायाब रंगों का
बर्फ की फूआरों का
झीलों की नग़मगी    का
फूलों की मुस्कुराहट का

ग़मों का पैमाना 
छलका है जब भी
किसी हसीन मंज़र ने
हल्के से हाथ थामा है मेरा 
मुझे और अमीर 
बहुत अमीर होना है
बस यही मक़सद है

Saturday, October 5, 2019

Cheekhta Sannata

Cheekhta sannata
A Nazm by Faridoon Shahryar 

Mustaqbil ko dafn kar
Aaj ko jataane aaye hain
Ragon mein behte paani ko
Uksaane aaye hain
Jadon ko apni khud hi kaat do
Shaakhon se behte khoon ko pocho 
Kal ke zakhmo ko tatolo
Kuredo, aur josh mein aao
Ek naye aaghaaz ka intzaar khatm hua
Aag se ulfat
Aur phir cheekhta sannata


चीखता सन्नाटा
फरीदूं शहरयार की नज़्म

मुस्तक़बिल को दफन कर
आज को जताने आये हैं
रगो में बहते पानी को उकसाने आये हैं
जड़ों को अपनी खुद ही काट दो
शाखों से बहते खून को पोछो 
कल के जख्मों को टटालो कुरेदो, और जोश में आओ
एक नए आग़ाज़ का इन्तिज़ार खत्म हुआ
आग से उल्फत 
और फिर  चीखता सन्नाटा