Faridoon Shahryar's Blog


Monday, February 10, 2020

जुर्रत का जंगल

जुर्रत का जंगल 
फ़रिदून शहरयार की नज़्म 

डरे सहमे हिरन को 
कुछ भेड़ियों ने
नोचने की कोशिश 
क्या खूब की 
बेनियाज़ शेर
अपनी हिकमत
से मूह मोड़ कर 
झुके हुए ज़मीर का 
बोझ लिए 
दूर चला गया 

चूटियों की फ़ौज
पहाड़ सा जोश लिए 
आगे बढ़ी 
लड़ी जी जान से 
दरिंदों के जिस्म 
में ज़हर था 
नुकीले दांतो में 
ख़ून की हवस 
सांसों में 
नफ़रत की बदबू 
ज़र्द नदी कांप उट्ठी 

जुर्रत के जंगल में 
कुछ ऐसा हमने देखा है 
शेरों के माथे पर पसीना है
जीत की ख़्वाहिश
मासूम सा ख़्वाब
लहू रगों में बेहिसाब 
मौत की परवाह से बेपरवाह अब
इंकलाब में ग़ज़ब का नशा है

Sunday, February 9, 2020

अनाथ रात

अनाथ रात
फरिदूं शहरयार की नज़्म

खौफ़ में लिपटी बदहवास रात 
चीखों से गूंजती अनाथ रात
दहशतगर्द हैं सड़कों की रोनक़
लहू में नहाई खौफ़नाक रात 
अंधेरा है हद ए निगाह के भी आगे
नारों की जंग है ये डर की रात
सवेरे पर पहरा लगाए बैठा है जानवर 
जोश ए जुनून के सहारे है लाचार रात
उजालों से गुरेज़ है इक हुक्मरान को
नाकामी के तख्त पर है आवारा रात

Tuesday, December 31, 2019

हसे भी हम रोए भी हम

हसे भी हम, रोए भी हम 
फ़रिदून शहरयार की नज़्म 

मज़ाक़ था
हसे भी हम 
संजीदा हुए 
रोए भी हम 
रेत का घर 
तामीर हुआ 
तसव्वुर के संगेमरमर से
मर मर गए हम 
हिमाक़त पे

अहमक़ों की जमात ने
फैसला कुछ ऐसा किया 
सुबह-ए-ऐलान 
एक बार फ़िर हुआ
जुनून मिस्मार हुआ 
चर्चा क्या ख़ूब रही 
नाव काग़ज़ की
चुपचाप से 
डूब गई

सब्र का पैमाना

सब्र का पैमाना लबरेज़ हुआ
अब जो भी होगा बुरा होगा 

Sunday, December 22, 2019

Zulm

ज़ुल्म की काली लंबी रात
लहू में डूबी, सिसकती रात 
#FaridoonShahryar

Saturday, November 16, 2019

मैं तय्यार हूं

मैं तय्यार हूं 
फ़रिदून शहरयार की नज़्म 

रगों में ख़ून की मिक़दार कुछ कम है
पानी भी है थोड़ा सा शायद
समझौता किया है
एक बार फिर से
दरिंदों की चीख़ों
में अब वो बात नहीं 
वो दहाड़ते अब भी हैं
पर फिर भी सो जाता हूं 
थोड़ा मुश्किल से ही सही 
लेकिन हस्ता रहता हूं 
किसी ना किसी बहाने से 
जीने की लत को नया जामा 
पहनाने की कोशिश में तल्लीन हूं
कोई और फ़रेब बुनो 
जाल फेको 
वो हर ख़्वाब जो तुमने देखा था
शायद ज़रूर कामयाब होगा 
मैंने भी ठान लिया है
खुशी से दोस्ती क़ायम रखूंगा 
आसुओं में लतपत सही 
उनकी नमी तुम्हारे आंखों के
दर तक नहीं पहुंचेगी 
आओ आगे बढ़ो 
मैं तय्यार हूं

Saturday, November 2, 2019

आस की कश्ती

आस की कश्ती 
फ़रीदून शहरयार की नज़्म 

बादलों के पार
ख़्वाब झील में
आस की कश्ती 
ख़ामोश उम्मीदों को
जज़्ब किए
बहे जा रही है

पहाड़ों का पैग़ाम 
आसमान पर 
गहरे हुरूफ़ में 
नाज़िल हुआ है
आंखों से नाउमीदी को पोछो
उठो, हाथ बढ़ाओ 
मुस्कुराओ