Faridoon Shahryar's Blog


Tuesday, December 31, 2019

हसे भी हम रोए भी हम

हसे भी हम, रोए भी हम 
फ़रिदून शहरयार की नज़्म 

मज़ाक़ था
हसे भी हम 
संजीदा हुए 
रोए भी हम 
रेत का घर 
तामीर हुआ 
तसव्वुर के संगेमरमर से
मर मर गए हम 
हिमाक़त पे

अहमक़ों की जमात ने
फैसला कुछ ऐसा किया 
सुबह-ए-ऐलान 
एक बार फ़िर हुआ
जुनून मिस्मार हुआ 
चर्चा क्या ख़ूब रही 
नाव काग़ज़ की
चुपचाप से 
डूब गई

सब्र का पैमाना

सब्र का पैमाना लबरेज़ हुआ
अब जो भी होगा बुरा होगा 

Sunday, December 22, 2019

Zulm

ज़ुल्म की काली लंबी रात
लहू में डूबी, सिसकती रात 
#FaridoonShahryar

Saturday, November 16, 2019

मैं तय्यार हूं

मैं तय्यार हूं 
फ़रिदून शहरयार की नज़्म 

रगों में ख़ून की मिक़दार कुछ कम है
पानी भी है थोड़ा सा शायद
समझौता किया है
एक बार फिर से
दरिंदों की चीख़ों
में अब वो बात नहीं 
वो दहाड़ते अब भी हैं
पर फिर भी सो जाता हूं 
थोड़ा मुश्किल से ही सही 
लेकिन हस्ता रहता हूं 
किसी ना किसी बहाने से 
जीने की लत को नया जामा 
पहनाने की कोशिश में तल्लीन हूं
कोई और फ़रेब बुनो 
जाल फेको 
वो हर ख़्वाब जो तुमने देखा था
शायद ज़रूर कामयाब होगा 
मैंने भी ठान लिया है
खुशी से दोस्ती क़ायम रखूंगा 
आसुओं में लतपत सही 
उनकी नमी तुम्हारे आंखों के
दर तक नहीं पहुंचेगी 
आओ आगे बढ़ो 
मैं तय्यार हूं

Saturday, November 2, 2019

आस की कश्ती

आस की कश्ती 
फ़रीदून शहरयार की नज़्म 

बादलों के पार
ख़्वाब झील में
आस की कश्ती 
ख़ामोश उम्मीदों को
जज़्ब किए
बहे जा रही है

पहाड़ों का पैग़ाम 
आसमान पर 
गहरे हुरूफ़ में 
नाज़िल हुआ है
आंखों से नाउमीदी को पोछो
उठो, हाथ बढ़ाओ 
मुस्कुराओ

Friday, October 25, 2019

बराबरी का परचम

बराबरी का परचम

फ़रीदूं शहरयार की नज़्म 

अम्मी की परेशानी
कुछ दस्तावेज़ पुराने 
पहचान की शिनाख़्त
वफ़ादारी का सबूत
कितना समझाया
कितना बहकाया
मां का दिल है 
बेचैन है
मुरझाया सा है

एक और मां का फ़ोन आया
"यासिर को फ़ोन करते रहना," उन्होंने कहा
आवाज़ में गुज़ारिश 
सांसों में मायूसी
अपने जाने के बाद भी 
घोंसले को आबाद रखने की
पुरज़ोर कोशिश 

इंशा को में भी तो
हर रोज़ तलख़ीन
करता रहता हूं
एक बेहतर समाज
में मुस्कुराए वो
आज़ादी जहां हक़ हो
भीख की गुहार नहीं
बराबरी का परचम 
जहां पुरसरार बुलंद हो
वहीं सांस ले 
मेरी बच्ची 
मैं चाहे नफ़रत  की आंधी में
फ़ना हो जाऊं
कोई बात नहीं

Monday, October 21, 2019

पागलों की बस्ती

पागलों की बस्ती 
फरिदूं शहरयार की नज़्म 

कोई हवा की वुसअतों को
कैद कर सके 
ऐसा कभी हुआ है क्या
कोई खुशबू की हदों को
एक तंग दायरे में 
महदूद कर सके 
दीवानापन नहीं तो क्या है ये
मौसिखी के मिज़ाज पर
अदाओं के रिवाज पर 
हिजाब कोई डाल सके 
सोचा भी कैसे ये
ये फरमान तो नाजायज़ है
नासाज़ हैं ये सिलवटें 
समाज पर कलंक है
भद्दे से दाग़ ये
पागलों की इस बस्ती में
शोर है अजीब सा 
अपनी ही घुट्ती सांसों में
हसरतों के सिसकने के 
चन्द लम्हे बाक़ी है
ख्वाबों के बीच की ये
दीवार बहुत ऊंची है